LAW'S VERDICT

बिना दिमाग लगाए दाखिल हो रही अपीलें, लॉ डिपार्टमेंट में ‘रेडिकल सर्जरी’ की जरूरत: हाईकोर्ट



दहेज मृत्यु केस में राज्य सरकार को झटका, अपील खारिज कर सरकार पर लगा ₹50 हजार का जुर्माना 

जबलपुर। Madhya Pradesh High Court ने दहेज मृत्यु से जुड़े एक मामले में राज्य सरकार द्वारा दायर आपराधिक अपील को जमकर आड़े हाथों लिया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस बीपी शर्मा की बेंच ने तल्ख़ टिप्पणी करके कहा कि इस अपील को देखकर लग रहा कि बिना किसी समझ के इसे हाईकोर्ट में दाखिल किया गया। ऐसे बिना कारण के दाखिल अपील के कारण हाईकोर्ट में मुकदमों की बाढ़ आ रही और इसके लिए खुद सरकार ही जिम्म्मेदार है। बेंच को यहाँ तक कहना पड़ा कि इस तरह के मुकदमो को देखकर लगता है कि  विधि विभाग में “रेडिकल सर्जरी” की आवश्यकता है। इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने राज्य सरकार पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया है, जिसे संबंधित दोषी अधिकारियों से वसूलने के निर्देश दिए गए हैं।

क्या था पूरा मामला

यह आपराधिक अपील धारा 378 CrPC के तहत राज्य सरकार द्वारा दायर की गई थी। अपील सेशंस ट्रायल क्रमांक 201100/2016 में 10 फरवरी 2022 को पारित उस फैसले के खिलाफ थी, जिसमें प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश, लखनादौन, जिला सिवनी ने आरोपी पुषोत्तम उर्फ़ गुड्डा को IPC की धारा 498-A, 304-B तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के आरोपों से बरी कर दिया था। राज्य की ओर से दलील दी गई थी कि मृतका मिलन यादव की शादी 27 अप्रैल 2016 को हुई थी और 7 नवंबर 2016 को सात महीने से कम समय में उसकी जलने से मौत हो गई। ऐसे मामलों में धारा 304-B IPC के तहत दहेज मृत्यु की धारणा लागू होती है।

ससुराल में हर मौत दहेज़ मृत्यु नहीं 

हाईकोर्ट ने कहा- अभियोजन पक्ष का कोई भी गवाह दहेज मांग या दहेज से जुड़ी प्रताड़ना को साबित नहीं कर सका। PW-1 सूरज यादव और PW-2 गिरिजा बाई ने स्वयं बयान दिया कि मृतका और आरोपी के बीच संबंध सामान्य और सौहार्दपूर्ण थे। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि “कम समय में विवाहिता की मृत्यु दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन हर ऐसी मृत्यु को दहेज मृत्यु नहीं कहा जा सकता।”

लॉ डिपार्टमेंट पर कड़ी टिप्पणी

कोर्ट ने राज्य के डिप्टी डायरेक्टर, प्रॉसिक्यूशन और लॉ एंड लेजिस्लेटिव अफेयर्स डिपार्टमेंट की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि बिना किसी गंभीर न्यायिक त्रुटि (grave miscarriage of justice) के बरी के आदेश के खिलाफ अपील नहीं की जानी चाहिए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अपील यांत्रिक तरीके से दायर की गई, जो विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। यहां तक कहा गया कि विभाग में “रेडिकल सर्जरी” की आवश्यकता है।

₹50 हजार का जुर्माना, रेड क्रॉस में जमा होगा

हाईकोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए ₹50,000 का जुर्माना लगाते हुए कहा कि यह राशि रेड क्रॉस सोसाइटी, जबलपुर में जमा कराई जाए। साथ ही कहा कि यह रकम उन अधिकारियों से वसूल की जाए, जिन्होंने बिना विवेक के अपील दाखिल करने की राय दी।

क्यों अहम है यह फैसला

यह फैसला उन मामलों में नजीर माना जा रहा है, जहां बरी के आदेशों के खिलाफ राज्य सरकारें बिना ठोस आधार अपील दायर कर देती हैं। हाईकोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि दहेज मृत्यु जैसे गंभीर मामलों में भी कानूनी मानकों और साक्ष्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती

CRA-8682-2022

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